February 16, 2026

हल्द्वानी में नन्ही परी को इंसाफ के लिए उमड़ा जनसैलाब, कई कलाकार भी कूदे

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वर्ष 2014 में हल्द्वानी में हुई 7 वर्षीय ‘नन्ही परी’ हत्याकांड से जुड़े मामले में हाईकोर्ट से दोषी करार आरोपियों को सुप्रीम कोर्ट से बरी होने पर प्रदेशभर की जनता में आक्रोश है. ये आक्रोश अब सोशल मीडिया से निकलकर सड़कों पर दिखाई देने लगा है. पिथौरागढ़ के बाद अब नैनीताल जिले के हल्द्वानी की सड़कों में लोगों का सैलाब नजर आया. लोगों ने प्रदर्शन कर अपना गुस्सा जाहिर किया.

 

18 सितंबर को हल्द्वानी के बुद्ध पार्क में बड़ी संख्या में सामाजिक संगठन और लोक कलाकार के साथ स्थानीय लोगों ने ‘नन्ही परी’ गैंगरेप मर्डर केस के विरोध में सड़कों पर उतरकर प्रदर्शन किया. लोगों ने हाथों में तख्ती लेकर आरोपी को फांसी की सजा की मांग करते हुए नारेबाजी की.

 

इसके बाद धरना स्थल बुद्ध पार्क से प्रदर्शनकारी एसडीएम कोर्ट तक जाने की कोशिश करने लगे. लेकिन पुलिस ने उन्हें रोक दिया. इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच जमकर नोक झोंक हुई. लेकिन प्रदर्शनकारियों की संख्या ज्यादा होने के कारण पुलिस की एक नहीं चली और प्रदर्शनकारियों ने सिटी मजिस्ट्रेट कार्यालय पहुंचकर माध्यम से राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा.

 

प्रदर्शनकारियों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पीड़िता परिवार और स्थानीय जनता बेहद निराश और आक्रोशित है. उन्होंने कहा कि मासूम बच्ची की निर्मम हत्या ने हर किसी को झकझोर दिया था. इस घटना को लेकर लोगों की अपेक्षा थी कि सुप्रीम कोर्ट पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए कठोरतम फैसला सुनाएगा. लेकिन अदालत के हालिया आदेश ने लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया. इसी वजह से गुस्सा सड़कों पर साफ दिखाई दे रहा है. लोगों का कहना है कि यह फैसला न्यायपालिका पर सवाल खड़े करता है. प्रदर्शन में हल्द्वानी विधायक सुमित हृदयेश के अलावा उत्तराखंड की मशहूर लोक कलाकार श्वेता महरा, इंदर आर्य, प्रियंका मेहरा, गोविंद दिगारी के अलावा कई कलाकार मौजूद थे.

 

ये है मामला: नवंबर 2014 में पिथौरागढ़ की 7 वर्षीय मासूम ‘नन्ही परी’ अपने परिवार के साथ काठगोदाम में एक रिश्तेदार के यहां शादी में आई थी. एक दिन ‘नन्ही परी’ लापता हो गई. करीब पांच दिन बाद बच्ची का शव गौला नदी के किनारे लगभग 500 मीटर दूर जंगलों में मिला था. जांच में बच्ची के साथ पहले दुष्कर्म और फिर निर्मम हत्या की बात सामने आई थी. मामले ने पूरे क्षेत्र में भारी आक्रोश पैदा कर दिया था. जगह-जगह धरना प्रदर्शन भी हुए थे.

 

खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री हरीश रावत को भी मौके पर आकर लोगों को शांत कराना पड़ा था. पुलिस ने मामले में तीन आरोपियों को नामजद किया था. बाद में एक आरोपी मसीह को दोषमुक्त कर दिया गया था. जबकि मुख्य आरोपी अख्तर अली को पॉक्सो अधिनियम और आईपीसी की धारा 376 के तहत दोषी करार देते हुए उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मौत की सजा सुनाई थी. जबकि दूसरे आरोपी प्रेमपाल को पांच साल की कैद और जुर्माना लगाया गया था.

 

पूरे मामले में आरोपी पक्ष ने मौत की सजा को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. जहां सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी अख्तर अली को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है.

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